संवैधानिक मर्यादा

संविधान दिवस की शुभकामनाएं।

संवैधानिक भावनाओं के प्रतिकूल व्यवस्था से पनपा भ्रष्टाचार शिष्टाचार है?
हमारी सरकार और जनप्रतिनिधि संविधान को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए शपथ लेते हैं।अनिवार्य शिक्षा और स्वास्थ्य हमारा मौलिक संवैधानिक अधिकार हैं। संविधान यह भी कहता है कि कोई भी सरकार मादक पदार्थों को बेचकर राजस्व संग्रह नही कर सकता है।इस तरह के कई सरकारों का उदाहरण है जो संविधान का शपथ लेकर असंवैधानिक काम करती रही है।क्या ऐसी सरकार को संविधान का झूठी शपथ लेने वाली कहना उचित होगा?
सामान्यतः मुठ्ठी भर नागरिक सरकार की जायज नजायज क्रियाकलापों की जनता पर पड़ने वाली असर का स्पष्टता के साथ तथ्यात्मक पहलुओं को रखते हैं,और अधिकांशतः चुप रहते हैं या  बिना प्रभाव के जाने समझे अंधभक्त बन रहे हैं, यही देश की जनता की सबसे बड़ी विडंबना है। सरकार से हिसाब किताब लेना जनता का अधिकार है।इसलिए हमें सच और सत्य की बारीकियों को जानने समझने की जरूरत है।
मनमोहन सिंह सरकार ने सूचना का अधिकार कानून और रोजगार गारंटी  योजना लागू कर  वेहतरीन काम किया ।इनके शाशनकाल में लगे भ्रष्टाचार का दाग से मोहभंग होकर जनता ने मोदी को विकल्प के तौर पर चुना।लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार किसी को सजा दिलाने बजाय,सभी बरी हो गए। भाजपा के अटल मोदी सरकार का एक दो वेहतर कामों को छोड़कर एक भी आमलोगों से जुड़े काम  सरजमीं पर नही दिखाई दे रहा है। एक्सप्रेस रोड बनाने का श्रेय अटल जी को जाता है, लेकिन वो भी टाल वसूली आधारित।अटल जी ने एक कैबिनेट मे सरकारी सेवकों का पेंशन खत्म किया गया तो दूसरी कैबिनेट में मंत्रियों व जनप्रतिनिधियों के वेतन भत्ते पेंशन सुविधाएं बढाने का काम किया। मोदीजी ने सुचना अधिकार के कानून को बदलने की कोशिश की और कुछ प्रावधान को बदल भी डाले।वादा तो काला धन सौ दिन के अंदर लाने की थी, इसके वजाय सर्वक्षमा योजना लाकर कालाधन सफेद करवाया गया, जिसका लाभ मायावती समेत सभी कयी नेताओं और अन्य लोगों ने उठाया।मारीशस से आने बाला काला धन आज भी  भारत में सफेद  से हो रहा है। आर्थिक विषमताएं आकाश जमीन का फासला दिखाई पड़ रहा है। गांधी लोहिया और जयप्रकाश के समतावादी सिद्धांतों को उनके अनुयायियों की सरकार भी लागू करने में विफल रहे हैं। सभी सरकारों ने कोरपोरेटवाद सिद्धांतों को जय-जयकार कर अपनाया है।
इलेक्ट्राल बोंड से चुनावी चंदा लेने की कानूनी रूप देकर राजनीति सुचिता का मार्ग अवरूद्ध कर दिया गया है।
आज लोगों को जरूरत है,वेहतर मुफ्त शिक्षा व चिकित्सा की।न्यायलयों में जजों की बहाली अखिल भारतीय न्यायिक आयोग का गठन कर जिस प्रक्रिया से आईएएस और आईपीएस नियुक्त हो रहे हैं। मनमोहन सिंह सरकार से अपेक्षाकृत  चेतक धोड़े की तरह तेज गति से मोदी सरकार निजीकरण कर रही है। निजीकरण मजबूर लाचार वेवश और अक्षम सरकार ही करती है, जिससे स्वंग अपना पब्लिक की संस्थाओं का व्यवस्था नही संभलती है।गौर करने बाली अहम बात यह है कि  निजीकरण करने के नाम पर पार्टियां वोट भी नही मांगती है।खेती किसानी और छोटे व्यापारी परेशान हैं। पूंजीपतियों को छूट जितना दिया गया है, उतना में तो  किसान समेत सारे लोगों का ऋण माफ हो सकता था। मोदी सरकार का सरकारी मेडिकल कालेज खोलने का निर्णय वेहतर है। लेकिन आयुष्मान योजना के वजट में   मुफ्त में इलाज की व्यवस्था आस्ट्रेलिया की भांति होता तो वेहतर था।अभी तक देश में सस्ता सुलभ यातायात ,शुद्ध खान-पान की व्यवस्था  और सस्ती दबाई व इलाज की समुचित व्यवस्था नही है। सरकारी विज्ञापन में पारदर्शी नीतियां नहीं रहने से मिडिया सरकारों की जनविरोधी नीतियों के प्रति गंभीरता से नही रेखांकित करती है।भारत में नागरिकों के प्रति अविश्वास का सिद्धांत लागू है। सभी तरह की जांच करने वाली एजेंसियां स्वतंत्र व निष्पक्ष और जबावदेह नही है।भारत जैसा नौकरशाहों को शक्ति पूरे विश्व में कहीं नही दिया गया है। उन्हें वैसे पदों पर और योजना बनाने वाले आयोग में रखा में  जाता है, जिसमें उन्हें जमीनी जानकारी नही रहती है। सिर्फ समय बीतने से प्रोमोशन मिलते जाता है।
देश के लगभग नब्बे फीसदी लोग कमेरा यानि काम कर जीविकापार्जन करते हैं।इसका कोई संगठन नहीं है। मुठ्ठी भर पूंजीपतियों का वैश्विक संगठन है, जिसमें जाति धर्म का कोई बंधन नही है। यही पूंजीपति वर्ग कमेरा वर्गों को दिग्यभ्रमित करने के लिए जातीय धार्मिक भावनाओं को उभारते है,जिसे कोरपोरेट मिडिया वेहतर ढंग से परोसती हैं। कमेरा की पहचान जातीय और धार्मिक संगठनों के निर्माण के कारण गायब होता जा रहा है। अंधविश्वास और पाखंडपन रूपी धार्मिक कजली भी कमेरा की पहचान खत्म कर रही है।इसी का नतीजा है कि आमजन के मुद्दे पर चर्चा नही हो रहा हैं। लोगों को जितना आमदनी वेतन या अन्य श्रोतों से होती है, उतना में आसानी से जीविका चल सकता है, लेकिन गंभीर बीमारी  होने की परिस्थितिय मे मंहगी इलाज और बच्चों के बेहतर शिक्षा के लिए चिंतित लोग ना चाहते हुए भी नजायज तरीके से धन कमाने की होड़ मे लगे हुए रहते है।इस प्रकार के व्यवस्था दोष से पनपे भ्रष्टाचार को शिष्टाचार कहेंगे? सवाल भाजपा कांग्रेस का नही है। सरकारें आती है,जाती है, लेकिन व्यवस्था यथावत रहती है।इसलिए सभी कमेरा वर्गों को जाति और धार्मिक संगठनों से दूर रहकर वेहतर कमेरा समाज के निर्माण के लिए आगे आना होगा।बिहार में क्या हुआ? गोवा में क्या हुआ, मिजोरम में क्या हुआ?कर्नाटक में क्या हुआ? महाराष्ट्र में क्या हो रहा है? यह सब  दलीय  गंदी राजनीति का परिणाम है।दलीय टिकट खरीद कर जीतने वाले जनप्रतिनिधि सत्ता भोग के लिए ऐसा ही करेंगे।ऐसा नही है कि पार्टियों के चुने हुए सभी जनप्रतिनिधि खराब है, उन्हें दलीय अनुसाशन, ह्लिप सिस्टम चुप रहने के लिए मजबूर करता है।हमे दलीय राजनीति  से हटकर कर भी चरित्रवान लोगों को नई वेहतर व्यवस्था हेतु आगे लाना पड़ेगा। आज आंकड़ों और जातीय गणित से टिकट मिलता है, जिससे वेहतर लोग चुनाव लड़ने से परहेज़ करते हैं।कई देशों में चुनाव जीतने वाले को मतदान का पचास फीसदी से अधिक वोट लाना अनिवार्य है, ऐसा नही होने तक बार बार चुनाव होता है,ताकि  एक जाति धर्म की प्रासंगिकता वोट में नही रहे।  इसतरह की चुनावी सिस्टम से वहां सर्वांगीण विकास होता है और सबको साथ लेकर चलने की मजबूरी हो जाती है।इसतरह से नेक समाजसेवी और कर्मठ लोग चुनावी राजनीति में आने से चुनाव जीतकर वेहतर सरकार बनाएंगे ।
अमरीष कुमार सामाजिक कार्यकर्ता, खगड़िया।

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