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सुलगते आग,टूटते समाज को बचाना हम-सभी प्रबुद्ध आम नागरिकों का धर्म है।ऐसी नौबत तब आती है,जब संविधान का शपथ लेकर राजधर्म का पालन नहीं किया जाता है।ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे निर्वाचित जनप्रतिनिधि औपचारिक रुप से संविधान का शपथ लेकर हुकूमत करते हैं।अभी तक देश की आवाम को अंधकार में रखने के लिए भारतीय संविधान का लिखित ग्रंथ मुहैया नहीं कराया गया है। दिल्ली स्थित विभिन्न देशों के दूतावासों द्वारा अपने अपने देशों का संविधान/कानून की ग्रंथ मुफ्त में दिया जाता है।भारत सरकार को भी सभी परिवारों को भारतीय संविधान/कानूनी ग्रंथ मुफ्त में दिया जाना चाहिए,जिससे लोगों को कानून संबत देश समाज को चलने चलाने की प्रेरणा मिल सके।इससे राष्ट्रभक्तिरूपी भावनामयी खुशबू फैलेगी। देश की एकता,अखंडता का सर्वोच्च प्राथमिकता देकर ही धर्म जाति ,बेकवर्ड र्फारवर्ड,एसटी एससी की कृत्रिम अलग अलग पहचान है।सभी वर्गों को साथ लेकर ही विकशित भारत की परिकल्पना कर सकते हैं। क्या कारणें रही कि आजादी के सत्तर साल गुजरने के बाद भी सभी तरह के केटेगरी आज भी कायम हैं । नेताओं द्वारा वोट के समीकरणों के खातिर समाज को बांटने बाली बातें कही जाती है।कभी धर्म आधारित बहुसंख्यक हिन्दूत्व की भावनाओं को उभारता है,कभी अल्पसंख्यक कार्ड खेला जाता है,कभी एसटी एससी, ओबीसी और आरक्षण पक्ष विपक्ष की राजनीति किया जाता है।ऐसा करने का मूल मकसद अहम मुद्दे से आमजनों का ध्यान हटाना और सत्ता की नाकामयाबी छुपाना है।ऐसा करने का हमारा संविधान इजाजत भी नहीं देती है।अभी तक सभी क्षेत्रों में आरक्षित कोटे से बड़े नेताओं और बड़े नौकरशाह के परिवार ही लाभान्वित हुए हैं ,आमजनों की स्थिति जस का तस बनी हुयी है।इसीकारण से सभी केटेगरी (आरक्षित और गैरआरक्षित) के लोग अपने अपने अधिकार को पाने वास्ते संधर्ष के लिए बैचेन रहते हैं।इसी तरह का नमूना हाल के दिनों दलित ओबीसी आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधी लोग अपने अपने ढंग से भारत बंद कराकर देखने को मिला।इसी तरह से भविष्य में वर्ग संधर्ष भी देखने को मिल सकता है। समतामूलक समाज बनने तक तत्कालिक आर्थिक,समाजिक, शैक्षणिक परिस्थिति के कारण संविधान में आरक्षण को शामिल किया गया,जो आजतक दीर्घकालिक तौर पर कायम हैं। आरक्षित वर्ग में सत्ता में पहूंच वाली संपन्न जातियों को शामिल कर आरक्षण मे सेंधमारी किया गया,और कयी संपन्न जातियां शामिल होने के लिए संघर्ष कर रही है। आज देश धर्म,जाति आरक्षण के मुद्दे पर बटा हुआ है! आरक्षण का सीधा संबंध शिक्षा और सरकारी नौकरी से है। आरक्षण का एकमात्र समाधान है सबको समान और मुफ्त शिक्षा सरकार मुहैया करावे।शिक्षा में लागू दोहरी और मान्यता प्रणाली के कारण ही आरक्षण आज तक प्रासांगिक बनी हुई है।आरक्षण देने की मूल जड़ यही है। सभी वर्गों को एकसाथ समान और मुफ्त शिक्षा के मुद्दे को लेकर आन्दोलन करना चाहिए। तभी आरक्षण विरोध और समर्थन का मुद्दा सुलझेगा अन्यथा नहीं। हमारे राजनेता वोट के खातिर सुलझने नही देगा,क्यों वगैर समावेशी विकास किए बहुसंख्यक आरक्षित श्रेणी का वोट लेने के लिए आरक्षण का मुद्दा उठाता है और कभी कभार सामान्य श्रेणी का वोट पाने के लिए गोलमाल बात कर आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मामला उठाता है। सरकार की नीति से मालूम पड़ता है कि देश की सुरक्षा,विधि व्यवस्था और न्यायपालिका ही स्वामित्व लोकतांत्रिक अंग बची रहेगी,शेष सभी क्षेत्र कोरपोरेट द्वारा संचालित होगी।जब सरकारी नौकरी ही नहीं रहेगी तो आरक्षण किसे और कैसे मिलेगें?प्रमुख मुद्दा तो सरकारी नौकरी बचाना हैं,सारी व्यवस्थाएं सरकार ही चलावें ना कि सारी व्यवस्थाएं कोरपोरेट के हाथों में जा पाये।चीन ने भी उदारवादी आर्थिक नीति अपनाया,लेकिन उसका मुनाफा सरकार के खजाने में जाता है,ना कि भारत की तरह पूंजीपति के खजाने में जाता है।इसी कारण से निजी क्षेत्रों में भी आरक्षण की मांग उठने लगी है।इसकारण से आगे चलकर फिर सामाजिक टकराव देखने को मिल सकता है। लोकसभा और विधानसभाओं के कुछ सीटें एसटी एसटी के प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षित किये गये हैं,आच्छी बात है,लेकिन चुनाव दलीय चुनाव चिन्हों पर क्यों? ऐसे क्षेत्र के निर्वाचित जनप्रतिनिधि दलीय अनुशासन,ह्विप के कारण अपने समुदाय के हित में संसद या संसद के बाहर बोल नही सकते हैं।इस तरह काआरक्षण देने का क्या औचित्य है?यह मुद्दा भी उठना चाहिए। लोकतंत्र में किसी सीट को आरक्षित कर किसी जाति समुदाय के प्रतिनिधित्व करने या खड़ा होने से नहीं रोका जाना चाहिए।सभी को खड़ा होने का समानअवसर मिले,लेकिन कुछ निर्धारित सीटों पर वोट प्रतिशत का ग्रेस देकर आरक्षित श्रेणी वाले को जीत सुनिश्चित करने का फार्मूला देकर उस क्षेत्र का जनप्रतिनिधित्व करने का अवसर मिले। चुनावी प्रणाली में यह व्यवस्था लागू हो कि जीतने बाले को कुल मतदान का पचास फीसदी मत लाना अनिवार्य हो,ऐसा नहीं होने पर उस सीट पर दूबारा वोटिंग हो।तभी सभी तबके के लोग समान विकाश की परिकल्पना कर सकते हैं। छेद हमारी व्यवस्था में है और हम नाहक गलत मुद्दे में पड़कर आपस मे उलझे रहते हैं।
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