आरक्षण शब्दाबली का शोभा बढाऐगा ।इससे किसी का कल्याण नहीं होगा। वर्तमान के राजनैतिक दल के नेताओं द्वारा आरक्षण का मुद्दा कभी सुलझने नहीं देगा,वल्कि इस मुद्दे को बनाये रखने के लिए कभी आरक्षण विरोधी और कभी आरक्षण स्पोर्ट्स में धधकने वाली बयान देते रहते हैं।
आरक्षण से थोड़ी महरूम पट्टी रूपी राहत पिछड़ा, अतिपिछड़ा ,एस सी एस टी को मिलता है।अब नया आदेश से ८५ फीसदी आबादी वाले रिर्जव कटेगरी के लिए पचास फीसदी आरक्षण मिलेगा।और बड़ी चालाकी से १५फीसदी वगैर आरक्षित केटेगरी वालों के लिए भी स्वत: पचास फीसदी सीट आरक्षित हो गया।यानि जो रिजर्व केटेगरी बाले अभ्यर्थी ज्यादा अंक लाने के बाद भी सामान्य केटेगरी में नहीं जा सकता है , क्योंकि अगर अप्लाई रिजर्व केटेगरी में किया है,तो ज्यादा अंक रहने के बावजूद भी सामान्य केटेगरी में नहीं जा सकते हैं।अब आरक्षण का कोई मतलब नहीं रह गया है।
निजी क्षेत्र में आरक्षण नहीं है,आने वाले समय में देश की सुरक्षा,विधि व्यवस्था और न्यालय ही सरकारी अंग रहेगी,बांकी सभी क्षेत्र कोरपोरेट के द्वारा ही संचालित होगी।अगर नौकरी ही नहीं बचेगी तो आरक्षण किसे और कैसे मिलेंगे ?
इस मुद्दे पर सभी दल के खाशकर दलित और पिछड़े नेता चुप हैं।
जाति धर्म और आरक्षण वोट रूपी हथियार है,जिससे सरकार में शामिल लोग बगैर समावेशी विकास किए जाति पाती धर्म और आरक्षण का शहारा लेकर आराम से वोट ले लेता है।
सभी को समान मुफ्त शिक्षा चिकित्सा सरकार द्वारा लागू कर देने से आरक्षण स्वत: अप्रांसगिक हो जाएगें।इस दोनों क्षेत्रों में लागू दोहरी प्रणाली ही आरक्षण को जन्म देती है।
देश भर के सभी वोर्डों , विश्वविद्यालयों मे समान पाठ्यक्रम होनी चाहिए।सभी छात्रों को समान पोषाक ,भोजन, हाईटेक क्लास रुम सरकार को मुहैया कराना चाहिए । मान्यता देने की व्यवस्था से ही शिक्षा का बाजारीकरण हुआ है। राष्ट्रपति हो,जज हो, या पूंजीपतियों का संतान हो या गरीब का संतान हो सभी छात्रों को एक जैसा पोशाक भोजन क्लासरुम की व्यवस्था सरकार द्वारा मुहैया कराये वगैर भारत पुनः: विश्व गुरू नहीं बन सकता है,और ना शिक्षा में गुणात्मक सुधार हो सकता है,और ना ही जाति धर्म तथा आरक्षण पक्ष और आरक्षण विरोध की अवधारणा को खत्म किया जा सकता है।
आरक्षण से थोड़ी महरूम पट्टी रूपी राहत पिछड़ा, अतिपिछड़ा ,एस सी एस टी को मिलता है।अब नया आदेश से ८५ फीसदी आबादी वाले रिर्जव कटेगरी के लिए पचास फीसदी आरक्षण मिलेगा।और बड़ी चालाकी से १५फीसदी वगैर आरक्षित केटेगरी वालों के लिए भी स्वत: पचास फीसदी सीट आरक्षित हो गया।यानि जो रिजर्व केटेगरी बाले अभ्यर्थी ज्यादा अंक लाने के बाद भी सामान्य केटेगरी में नहीं जा सकता है , क्योंकि अगर अप्लाई रिजर्व केटेगरी में किया है,तो ज्यादा अंक रहने के बावजूद भी सामान्य केटेगरी में नहीं जा सकते हैं।अब आरक्षण का कोई मतलब नहीं रह गया है।
निजी क्षेत्र में आरक्षण नहीं है,आने वाले समय में देश की सुरक्षा,विधि व्यवस्था और न्यालय ही सरकारी अंग रहेगी,बांकी सभी क्षेत्र कोरपोरेट के द्वारा ही संचालित होगी।अगर नौकरी ही नहीं बचेगी तो आरक्षण किसे और कैसे मिलेंगे ?
इस मुद्दे पर सभी दल के खाशकर दलित और पिछड़े नेता चुप हैं।
जाति धर्म और आरक्षण वोट रूपी हथियार है,जिससे सरकार में शामिल लोग बगैर समावेशी विकास किए जाति पाती धर्म और आरक्षण का शहारा लेकर आराम से वोट ले लेता है।
सभी को समान मुफ्त शिक्षा चिकित्सा सरकार द्वारा लागू कर देने से आरक्षण स्वत: अप्रांसगिक हो जाएगें।इस दोनों क्षेत्रों में लागू दोहरी प्रणाली ही आरक्षण को जन्म देती है।
देश भर के सभी वोर्डों , विश्वविद्यालयों मे समान पाठ्यक्रम होनी चाहिए।सभी छात्रों को समान पोषाक ,भोजन, हाईटेक क्लास रुम सरकार को मुहैया कराना चाहिए । मान्यता देने की व्यवस्था से ही शिक्षा का बाजारीकरण हुआ है। राष्ट्रपति हो,जज हो, या पूंजीपतियों का संतान हो या गरीब का संतान हो सभी छात्रों को एक जैसा पोशाक भोजन क्लासरुम की व्यवस्था सरकार द्वारा मुहैया कराये वगैर भारत पुनः: विश्व गुरू नहीं बन सकता है,और ना शिक्षा में गुणात्मक सुधार हो सकता है,और ना ही जाति धर्म तथा आरक्षण पक्ष और आरक्षण विरोध की अवधारणा को खत्म किया जा सकता है।
Thanks
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